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रणदीप हुड्डा अपनी जड़ों से सदा जुड़े रहे और उस पगर्व करते आए हैं। वह बार-बार अपने मूल स्थान की बात करते रहे हैं और ऐसी कहानियाँ चुनते रहे हैं जो ज़मीनी सच्चाइयों को दिखाती हैं। देश और दुनिया के मंचों पर उन्होंने लगातार क्षेत्रीय संस्कृति, भाषाओं और पहचान का समर्थन किया है। बड़े स्तर की दौड़ में अपनी पहचान को कभी हल्का न करते हुए, रणदीप का मानना रहा है कि सच्चाई ही किसी कहानी की सबसे बड़ी ताकत होती है। यही सोच अब एक स्वाभाविक कदम के रूप में सामने आई है, जब वह स्टेज मंच के साथ बतौर प्रतिनिधि जुड़े हैं। (Randeep Hooda supporting regional language cinema)
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ऐसे समय में जब भारत का डिजिटल मनोरंजन जगत “मुख्यधारा” की परिभाषा बदल रहा है, हरियाणवी, राजस्थानी और भोजपुरी कहानियों पर केंद्रित मंच से रणदीप का जुड़ाव पूरी तरह स्वाभाविक लगता है, न कि केवल औपचारिक। यह साझेदारी इस विश्वास को दर्शाती है कि मातृभाषा में कही गई कहानियाँ भी प्रेरक, गरिमापूर्ण और दुनिया भर में अपनी गूंज बना सकती हैं। उत्तर भारत में पचपन लाख से अधिक भुगतान करने वाले दर्शकों के साथ, स्टेज का बढ़ता दर्शक वर्ग उसी सांस्कृतिक बदलाव को दिखाता है, जिसका समर्थन रणदीप लंबे समय से करते आए हैं।
यह सिर्फ एक प्रसिद्ध चेहरे के साथ जुड़ाव नहीं है, बल्कि भाषा और पहचान को सहेजने की साझा सोच पर आधारित सहयोग है। वर्ष दो हज़ार उन्नीस में इंदौर से शुरू होकर अब नोएडा में स्थित, स्टेज ने अपनी मौलिक फिल्मों, धारावाहिकों और शॉर्ट कथाओं के माध्यम से उन आवाज़ों को जगह दी है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा में नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
भारतीय सिनेमा के सबसे बहुरंगी कलाकारों में गिने जाने वाले रणदीप हुड्डा ने हाइवे, सरबजीत, कैट और एक्सट्रैक्शन जैसे कार्यों के ज़रिये हमेशा ज़मीनी, सच्चे और वास्तविक भारत से जुड़े किरदार चुने हैं। इस जुड़ाव पर बात करते हुए रणदीप ने कहा कि यह निर्णय उनके लिए बेहद निजी था। (Randeep Hooda grounded storytelling approach)
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रणदीप ने कहां, “मैं हमेशा मानता आया हूँ कि समय के साथ आगे बढ़ते हुए भी अपनी जड़ों को अपनाए रखना ज़रूरी है। मेरे लिए भाषा और संस्कृति कोई सीमा नहीं, बल्कि वह ताकत हैं जो हमें गढ़ती हैं और दुनिया को देखने का नज़रिया देती हैं। वही कहानियाँ सबसे लंबे समय तक हमारे साथ रहती हैं, जो जानी-पहचानी लगती हैं, सच्ची महसूस होती हैं और सच्चाई से जन्म लेती हैं। क्षेत्रीय भाषाओं और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करने वाली कहानियों से जुड़ना मेरे लिए बेहद भावनात्मक है, क्योंकि यह उन्हीं मूल्यों को दर्शाता है जिन्हें मैं हमेशा अपने साथ लेकर चला हूँ। (Randeep Hooda stage manch representative role)
इस साझेदारी के तहत रणदीप विभिन्न प्रचार माध्यमों के ज़रिये मंच का समर्थन करेंगे और घरों में सामूहिक रूप से देखे जाने वाले मनोरंजन के महत्व को भी सामने रखेंगे। उनका मानना है कि क्षेत्रीय भाषा की कहानियाँ तब और प्रभावशाली बनती हैं, जब उन्हें परिवार के साथ मिलकर देखा जाए।
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वर्ष दो हज़ार छब्बीस की ओर देखते हुए, मंच की आने वाली प्रस्तुतियों में जान लेगी सोनम।(भोजपुरी), विदेशी बहू (हरियाणवी) और कायंतर।(राजस्थानी) शामिल हैं। इसके अलावा पुनर्जन्म, महापुनर्जन्म और मोखन वाहिनी जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम भी नए रूप में लौटेंगे। दो मिनट की लघु कथाएँ इस मंच की एक अलग पहचान बन चुकी हैं। (Randeep Hooda belief in truth driven stories)
स्टेज मंच से पहले ही ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा जुड़े हुए हैं और अब रणदीप हुड्डा के शामिल होने से ऐसे व्यक्तित्व एक साथ आए हैं, जो उत्कृष्टता के साथ अपनी जड़ों से जुड़े रहना जानते हैं। दो सौ मिलियन से अधिक भाषा बोलने वालों के बीच मंच की बढ़त उस बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है, जहाँ क्षेत्रीय आवाज़ें अब किनारे नहीं, बल्कि भारत की बदलती मनोरंजन कथा के केंद्र में हैं।
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FAQ
Q1. रणदीप हुड्डा क्षेत्रीय भाषा के मनोरंजन को क्यों समर्थन दे रहे हैं?
रणदीप हुड्डा का मानना है कि सच्ची और ज़मीनी कहानियाँ ही किसी भी सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत होती हैं, और ऐसी कहानियाँ अक्सर क्षेत्रीय भाषाओं व संस्कृति से निकलती हैं।
Q2. रणदीप हुड्डा अपनी जड़ों को लेकर क्या सोच रखते हैं?
वह हमेशा अपनी जड़ों पर गर्व करते आए हैं और अपने मूल स्थान, संस्कृति और पहचान को खुले तौर पर सम्मान देते हैं।
Q3. रणदीप हुड्डा किस तरह की कहानियाँ चुनना पसंद करते हैं?
रणदीप आमतौर पर ऐसी कहानियाँ चुनते हैं जो ज़मीनी सच्चाइयों, मानवीय भावनाओं और सामाजिक वास्तविकताओं को दर्शाती हों।
Q4. स्टेज मंच के साथ रणदीप हुड्डा की भूमिका क्या है?
रणदीप हुड्डा स्टेज मंच के साथ बतौर प्रतिनिधि जुड़े हैं, जहाँ वे क्षेत्रीय भाषाओं और लोकल टैलेंट को बढ़ावा देने का काम करेंगे।
Q5. क्या रणदीप हुड्डा ने पहले भी क्षेत्रीय संस्कृति का समर्थन किया है?
जी हाँ, उन्होंने देश और विदेश के मंचों पर लगातार क्षेत्रीय संस्कृति, भाषाओं और पहचान का समर्थन किया है।
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